मोदी के डर से मुक्त होने का क्या यही सबसे अच्छा अवसर नहीं है ? -श्रवण गर्ग हमने इस बात पर शायद ही कभी गौर किया हो कि आपसी बातचीत या ‘गोदी चैनलों’की बहसों को देखने-सुनने के दौरान हम दिन के कितने घंटे सिर्फ़ एक ही व्यक्ति यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पिछले कितने सालों से खर्च कर रहे हैं ! हमें यह भी याद करके देखना चाहिए कि ऐसा हमने पिछली बार किस प्रधानमंत्री के लिए किया होगा कि साल भर तक सिर्फ़ उसके ही बारे में सोचते और उससे डरते रहे हों ! ऐसा तो सिर्फ़ अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में ही होता है। प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द एक ऐसा तंत्र विकसित हो गया है जिसने देश की एक बड़ी आबादी को सिर्फ़ मोदी की दैनंदिन की गतिविधियों और उनके व्यक्तित्व के दबदबे के साथ चौबीसों घंटों के लिए एंगेज कर रखा है। प्रधानमंत्री की उपस्थिति हवा-पानी की तरह ही नागरिकों की ज़रूरतों में शामिल कर दी गई है। पार्टी और तंत्र से परे प्रधानमंत्री की छवि एक ‘कल्ट’ के रूप में स्थापित कर दी गई है। कुछ ऐसा कर दिया गया है कि नागरिकों को कुछ और सोचने का मौका नहीं दिया जा रहा है। बेरोज़गारी और महंगाई तो बहुत दूर की बात है। ...
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सरकार की पराजय को राष्ट्र की हार में बदलना चाहते हैं मोदीजी ? -श्रवण गर्ग महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पारित करवाने के लिए अमित शाह जिस ज़बर्दस्त तैयारी के साथ लोकसभा में आए थे उससे समझा जा सकता है कि 17 अप्रैल को हुई पराजय से सरकार को कितना बड़ा सदमा पहुँचा होगा ! प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश में विपक्ष के ख़िलाफ़ फूटा ग़ुस्सा इसका प्रमाण है। राष्ट्र के नाम संदेश के पीछे के और क्या कारण हो सकता था ? आख़िरी बार ऐसा कोई संदेश 7 जून 2021 को कोविड के राष्ट्रीय संकट के दौरान प्रसारित हुआ था ! क्या संशोधन विधेयक पर पराजय को बीजेपी किसी राष्ट्रीय संकट में तब्दील करना चाहती है ? (देश की जनता और नारी शक्ति क्या विपक्षी दलों-कांग्रेस, डीएमके, तृणमूल और सपा- के ख़िलाफ़ राष्ट्र के नाम संदेश में लगाए गए इन आरोपों में यक़ीन करेगी कि ये चार दल भ्रूण हत्या के अपराधी हैं और संशोधन विधेयक के विरोध का जो अपराध इन्होंने किया है उसकी उन्हें सज़ा ज़रूर मिलेगी ! ) अमित शाह द्वारा लोकसभा में दिये गये जवाब के पैंतीसवे मिनिट के दौरान जो हुआ उसके ज़रिए सरकार की पूर्व-तैयारी को सम...
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‘ गोदी मीडिया ’ के ‘ एप्सटीन ’ दस्तावेज कब बाहर आएँगे ? - श्रवण गर्ग मेरे जैसे उन तमाम लोगों को जिन्होंने किसी ज़माने में ‘ दूरदर्शन ’ के शानदार उदघोषकों के साथ टीवी के पर्दों पर अपनी सुबह और शामें बिताई हैं उन्हें इस वक्त जो चल रहा है उसे देखते हुए सौम्य व्यक्तित्व की धनी समाचार - वाचिका सरला माहेश्वरी के हाल में हुए निधन से उत्पन्न हुई रिक्तता की पीड़ा को महसूस करने में ज़्यादा कठिनाई नहीं महसूस करना चाहिए ! पूँजीपतियों की गोद में खेल रहे चैनलों...