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  सड़कों पर उतरा हुआ मुल्क वापस घर नहीं लौटता ! -श्रवण गर्ग  बारह साल की ‘अधिनायकवादी’ हुकूमत में हुए पहले इस्तीफ़े (या 17 अक्तूबर 2018 को ‘Me Too’ आंदोलन की भेंट चढ़े एम जे अकबर के बाद दूसरे) ने बीजेपी,संघ और एनडीए के सहयोगी दलों की चूलें हिला दी हैं। गुजरात में भोगे गए सत्ता के तेरह साल के एकछत्र शासन को भी मिलालें तो मोदीजी के पच्चीस सालों के लंबे राजनीतिक जीवन में यह पहला सदमा था कि सत्ता की जिस कमर को झुकवाने में किसानों को साल भर लग गया और साढ़े सात सौ लोगों को अपनी कुर्बानियां देनी पड़ीं उसकी रीढ़ में सिर्फ़ एक छात्र आंदोलन ने 36 दिनों में छेद कर दिया।  पवित्र गुफाओं और शिलाओं पर की गई तपस्या से कमाया गया सत्ता का समस्त अहंकार एक झटके में ध्वस्त हो गया ! अतिरंजित आत्मविश्वास की नक़ाब आधी रात को कब खिसक गई और परास्त नायक का असली चेहरा मुल्क के सामने कब प्रकट हो गया पता ही नहीं चल पाया। देश स्तब्ध रह गया।  कथित तौर पर कुख्यात इज़राइली तंत्र और तकनीकी की मदद से चलने वाले ख़ुफ़िया साम्राज्य को सूंघ तक नहीं पड़ी कि बीस जुलाई को जो मार्च संसद की तरफ़ कूच करने वाला ह...
  क्या   मोदीजी   डर   गए   हैं   कि   अब   बच्चे   भी   उनसे   नहीं   डरते  ? - श्रवण   गर्ग   कॉकरोच   जनता   पार्टी   का   असली   आंदोलन   तो   अब   शुरू   हुआ   है।   उसकी   ताक़त   की   परीक्षा   अब   होनी   है   कि   वांगचुक   की   अनुपस्थिति   में वह कैसे और कितने दिन  चल   पाता   है।   पार्टी   के   पास   सोनम   वांगचुक   के   क़द   का   कोई   अन्य   चेहरा   नहीं   है।सिद्ध   करना   पड़ेगा   कि   किसी   अण्णा   हजारे   या वांगचुक  के   बिना   भी   आंदोलन   को   ज़िंदा   रखा   जा   सकता   है।   कॉकरोचों   का   आंदोलन   अगर   हक़ीक़त   में   ग़ैर - राजनीतिक   और   गांधीवादी   है तो  ...