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  धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय ?   -श्रवण गर्ग  जनता इतने आत्मविश्वास के साथ क्यों दावा कर रही है कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में हुए चंदे-चढ़ावे के घोटाले में कुछ भी नहीं होगा या कुछ निकलेगा ? असली दोषियों के न कभी नाम बाहर आएँगे और न उनका बाल कोई बाँका होगा ? घोटाले की जाँच के लिए बनाए गए विशेष जाँच दल द्वारा कोई सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन भी नहीं होगा। दल का कार्यकाल वैसे भी 15 जुलाई तक बढ़ गया है। मुमकिन है जाँच का दायरा बढ़ाकर कार्यकाल फिर से बढ़ा दिया जाए।  उसके भी पहले ग्यारह जुलाई को महासचिव चंपतराय तथा सदस्य अनिल मिश्रा द्वारा तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट से दिये गए त्यागपत्रों पर विचार किया जाएगा ! कौन विचार करेगा ? क्या वे जिन पर आरोप है कि आस्थाओं के साथ हुए विश्वासघात में उनकी भूमिका भी संदेहों से परे नहीं है या कोई अन्य ?  चंपतराय के विकल्प की तलाश प्रारंभ हो चुकी है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि अब कह रहे हैं कि वे कोषाध्यक्ष तो थे लेकिन उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी। किसी भी काम में उनका कोई दखल नहीं था। श्रद्धालुओं के बीच इस तरह की बातें क्यों ह...
  ‘ नागरिकों ’  को  ‘ शरणार्थियों ’  में   बदलने   का   षड्यंत्र   तो   नहीं   है  ?  - श्रवण   गर्ग   बात   कोलकाता   के   प्रसिद्ध   सत्ता - विरोधी   अंग्रेज़ी   दैनिक  ‘ द   टेलीग्राफ ’  के   पूर्व   संपादक - पत्रकार   आर   राजगोपाल   की   पीड़ा   से   शुरू   करते हैं।राजगोपाल   की   पीड़ा   हालाँकि   काफ़ी   चर्चा   में   आ   चुकी   है   फिर   भी   मूल   विषय   को   आगे   बढ़ाने   के   लिए   उसका   उल्लेख   ज़रूरी   है।   पश्चिम   बंगाल   में   हुए   हाल   के   विधानसभा   चुनावों   में  SIR  के   तहत   जिन   लाखों   लोगों   के   नाम   मतदाता   सूचियों   से   बाहर   कर   दिये   गए   थे उनमें...