गोदी मीडिया’ के ‘एप्सटीन’ दस्तावेज कब बाहर आएँगे ? 


-श्रवण गर्ग 


मेरे जैसे उन तमाम लोगों को जिन्होंने किसी ज़माने में ‘दूरदर्शन’ के शानदार उदघोषकों के साथ टीवी के पर्दों पर अपनी सुबह और शामें बिताई हैं उन्हें इस वक्त जो चल रहा है उसे देखते हुए सौम्य व्यक्तित्व की धनी समाचार-वाचिका सरला माहेश्वरी के हाल में हुए निधन से उत्पन्न हुई रिक्तता की पीड़ा को महसूस करने में ज़्यादा कठिनाई नहीं महसूस करना चाहिए !


पूँजीपतियों की गोद में खेल रहे चैनलों में एक की एक महिला न्यूज़ एंकर को जब देश की जनता ने आक्रामक अंग्रेज़ी में यौन दुराचारी एप्सटीन का बचाव करते हुए देखा तो सन्न रह गई। एंकर ने जब तर्क दिया कि एप्सटीन की निजी दुराचारी ज़िंदगी(जिसमें वह छोटी-छोटी बच्चियों का यौन शोषण करता थाउसके सार्वजनिक जीवन (जिसमें वह प्रभावशाली लोगों से संपर्क रखता था और दूसरों का उनसे करवाता थासे पूरी तरह अलग थी तो  तो टीवी की स्क्रीन काँपी और  ही थर्राई ! 


जनता ने  फिर देखा कि हिन्दी के एक प्रसिद्ध चैनल की एक तारिका एंकर ज्ञान दे रही है कि मुग़ल सम्राट बाबर किस तरह का ‘बाइसेक्सुअल’ था ! कैसे बाज़ार में घूमते हुए बाबर की नज़र एक खूबसूरत ‘लौंडे’ पर पड़ गई और बादशाह बेचैन हो उठे थे। 


जनता  सिर्फ़ ‘भगवानों’ की तरह से शासकों के भी अलग-अलग शृंगारों में प्रतिदिन दर्शन कर रही हैउन एंकरों को भी सुबह-शाम देख रही है जो मेक-अप की मोटी-मोटी परतें चेहरों पर चढ़ाए मुल्क की ग़रीबी का मज़ाक़ उड़ाने वाले वस्त्र धारण करके देश के विकास पर बहसें करवाते रहते हैं। कम उम्र की युवा एंकर वक्ताओं से सवाल करती हैं : ‘झूठ बोलने का इतना कलेजा कहाँ से लाते हैं आप ?’


एक ज़माना था जब हम देखते थे कि ‘दूरदर्शन’ के साथ संबद्ध हिन्दी-अंग्रेज़ी के प्रतिभाशाली उदघोषक बिना किसी ख़ौफ़ के इंदिरा गांधी के साथ कंधों से कंधा सटाकर फ़ोटो खिंचवा रहे हैंगर्व के साथ मुस्कुराहटें बिखेर रहे हैं। हम आज देख रहे हैं कि बहसों के दौरान चैनलों  पर गुर्राते रहने वाले एंकर किस तरह शासकों के श्रीचरणों में लोटपोट हो सत्ता-प्रतिष्ठान का प्रशस्तिगान कर रहे हैं !


सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ताज़ा उदाहरण है जिसमें अपनी कार की विंडो से राहुल गांधी चरण-चुंबक पत्रकारों को उनसे लगातार सत्ता-प्रेरित सवाल पूछते रहने के लिए यह जानते हुए भी फटकार लगाते दिखते हैं कि इससे (पत्रकारों को)कोई फ़र्क़ नहीं पड़नेवाला है ! अब तो हो यह गया है कि अपनी प्रेस कांफ्रेंस में किसी रिपोर्टर के खड़े होते ही राहुल समझ जाते हैं कि उनसे क्या सवाल पूछा जाने वाला है ! सत्ता प्रतिष्ठान की तरह गोदी मीडिया ने भी अपनी चमड़ी मोटी कर ली है।


मीडिया के नाम पर ‘ज़हरीले’ एंकरों और कतिपय पत्रकारों द्वारा जो किया जा रहा है वह भी एक तरह की ‘मॉब लिंचिंग’ ही है। एक ऐसी लिंचिंग जिसमें देखने-सुनने वालों की निर्दोष आत्माओं का रक्तहीन संहार बे-रोकटोक किया जाता है। सत्ता पर क़ाबिज़ शासक संसदीय परंपराओं और संवैधानिक संस्थानों को बंधक बनाने में जुटे हैं और ‘घोषित आपातकाल’ के पहले शिकार मीडिया ने ‘अघोषित आपातकाल ’ में लोकतंत्र को निस्तेज और प्रतिरोध को नपुंसक बनाने की सुपारी ले रखी है ! सवाल यह है कि एप्सटीन की तरह ‘गोदी मीडिया’ के दस्तावेज कब बाहर आएँगे ? 





Comments

Popular posts from this blog