डर तो अमित शाह से लगना चाहिए ! मोदी से नहीं !
-श्रवण गर्ग
दस दिसंबर के ऐतिहासिक दिन ‘वोट चोरी’ या SIR पर हुई बहस का जवाब अगर प्रधानमंत्री मोदी देते तो क्या वे भी उनके भाषण के बीच विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हस्तक्षेप पर वैसे ही नाराज़गी जाहिर करते जैसे गृह मंत्री अमित शाह को होते हुए देश-दुनिया ने देखा और तीखी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की ? अमित शाह अगर राहुल गांधी पर, चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही, इतने आक्रामक अंदाज़ में नज़र नहीं आते तो दुनिया को पता ही नहीं चल पाता कि आने वाले समय में मोदीजी के सपनों के ‘विकसित भारत’ के किस स्वरूप की कल्पना की जानी चाहिए !
आम जनता के बीच अगर चर्चाएँ इसी तरह की हैं कि मुल्क हक़ीक़त में तो अमित शाह ही चला रहे हैं और मोदीजी के असली उत्तराधिकारी भी वे ही हैं तो फिर संसद के नज़ारे को देख लेने के बाद कुछ इस तरह की संसदीय व्यवस्था के बारे में सोच लेना चाहिए जिसमें विपक्ष की ज़ुबान पर पूरी तरह से लगाम कस दी जाएगी और स्पीकर कोई मदद नहीं कर पाएँगे !
राहुल गांधी की इस चुनौती पर कि ‘वोट चोरी’ पर हुई उनकी प्रेस कांफ्रेंस पर गृह मंत्री संसद में डिबेट करवा लें, अमित शाह द्वारा आपा खो कर यह जवाब देना कि: ‘नेता विपक्ष कह रहे हैं कि पहले मेरी बात का जवाब दो !आपकी मनमानी से संसद नहीं चलेगी। मैं एक-एक बात का जवाब दूँगा पर मेरे भाषण का क्रम वे नहीं तय कर सकते, मैं करूँगा’। राहुल गांधी पर अमित शाह के क्षणिक ग़ुस्से के बाद विपक्ष से ज़्यादा गहरा सन्नाटा सत्तारूढ़ दल की बेंचों पर छा गया।
शाह के व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया में राहुल गांधी ने बाद में रिपोर्टरों से कहा कि उन्होंने ग़लत भाषा का इस्तेमाल किया; उनके हाथ काँप रहे थे; आपने सब कुछ देखा होगा; वे मानसिक रूप से दबाव में थे जिसे संसद में पूरे देश ने देखा।
अमित शाह के बुधवार को लोकसभा में नाराज़ी ज़ाहिर करने के सिर्फ़ एक दिन पहले मंगलवार को चेन्नई में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक सवाल के जवाब में यह कह कर हलचल मचा दी थी कि अगले प्रधानमंत्री के नाम का फ़ैसला पूरी तरह से नरेंद्र मोदी और बीजेपी को ही करना है। कुछ सवाल ऐसे हैं जो मेरी परिधि से बाहर हैं। इसलिए उनके बारे में मेरा कोई कथन नहीं है। मैं केवल शुभकामनाएँ ही व्यक्त कर सकता हूँ ,इससे अधिक कुछ नहीं !
भागवत के कथन का अर्थ यही लगाया जा रहा है कि पचहत्तर साल की उम्र में रिटायरमेंट की बहस से पल्ला झाड़ लेने के बाद अबभागवत ने प्रधानमंत्री पद के उत्तराधिकारी का मुद्दा भी मोदी और बीजेपी पर छोड़ दिया है। इसका मतलब यह भी लगाया जा सकता हैकि पार्टी अध्यक्ष का नाम भी मोदी ही तय करेंगे ! संघ अब पिक्चर से बाहर है।
अमित शाह के कहे पर विपक्ष की नाराज़ी के बीच उल्लेखनीय यह है कि मोदी ने गृहमंत्री के जवाब को असाधारण निरूपित किया है।मोदी ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा कि अमित शाह ने पुख़्ता तथ्यों के साथ न सिर्फ़ हमारी चुनावी प्रक्रिया के विविध आयामों और प्रजातंत्रकी ताक़त को मज़बूती के साथ रखा विपक्ष के झूठ का भी पर्दाफ़ाश किया।
दूसरी ओर,ममता बनर्जी ने 11 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के नादिया ज़िले के मुख्यालय कृष्णानगर में एक रैली को संबोधित करते हुए अमित शाह को एक ‘ख़तरनाक’ व्यक्ति बताया और कहा गृहमंत्री की दोनों आँखें विनाश का संदेश देती हैं। उनकी एक आँख में दुर्योधन नज़र आता है और दूसरी में दुःशासन !
मोदीजी द्वारा गुजरात और केंद्र में दो दशक पूरे करने पर कुछ साल पहले दिए गये एक साक्षात्कार के दौरान पूछे गए एक सवाल के जवाब में अमित शाह ने कहा था :’प्रधानमंत्री निरंकुश या तानाशाह नहीं हैं। इस तरह के सभी आरोप निराधार हैं।मोदीजी सभी लोगों की बात धैर्यपूर्वक सुनने के बाद ही फ़ैसले लेते हैं।उन्होंने दशकों के लम्बे जुड़ाव के दौरान नरेंद्र मोदी जैसा कोई श्रोता नहीं देखा। एक छोटे से कार्यकर्ता की भी बात वे धैर्य से सुनते हैं।’
दस दिसंबर को देश की संसद में जो दृश्य उपस्थित हुआ,अमित शाह ने कथित तौर पर जिस तरह से विपक्ष के नेता का अपमान किया (‘कुछ परिवार ऐसे हैं जो पुश्तैनी वोट चोरी करते हैं’) या ‘गाली’ का भी उपयोग हुआ, देश के गृहमंत्री को लेकर ऊपर जैसा ही कोई सवाल पूछे जाने पर उत्तर क्या मिलना चाहिए ?
क्या ऐसा नहीं मान लेना चाहिए कि ‘मोदी के बाद कौन ?’ सवाल के उत्पन्न होने के पहले ही अमित शाह ने अपने ‘विराट’ स्वरूप को देश के समक्ष प्रकट कर दिया ?
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