हरिवंश कथा और संसदीय व्यथा श्रवण गर्ग वे तमाम लोग जो नीतिपरक (एथिकल ) पत्रकारिता की मौत और चैनलों द्वारा परोसी जा रही नशीली खबरों को लेकर अपने छाती-माथे कूट रहे हैं, उन्हें हाल में दूसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए खाँटी सम्पादक-पत्रकार हरिवंश नारायण सिंह को लेकर मीडिया में चल रही चर्चाओं पर नज़र डालने के बाद अपनी चिंताओं में संशोधन कर लेने चाहिए। वैसे यह बहस अब पुरानी पड़ चुकी है कि कैसे उस ‘काले’ रविवार (बीस सितम्बर) को लोकतंत्र की उम्मीदों का पूरी तरह से तिरस्कार करते हुए देश के कोई साठ करोड़ किसानों और खेतिहर मज़दूरों को सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर कर दिया गया। यह आलेख मूलतः उन सुधी पाठकों के लिए है, जो पत्रकारिता और राजनीति के बीच गहरी होती जा रही साठगाँठ को अंदर से समझना चाहते हैं। बिहार की वर्तमान राजनीति के महत्वाकांक्षी नायक नीतीश कुमार के आधिपत्य वाली जद (यू ) की ओर से राज्यसभा में पहुँचने के पहले तक हरिवंश नारायण सिंह की उपलब्धियाँ एक निर्भीक और वैचारिक रूप से पारदर्शी समाजवादी पत्रकार की रही हैं। मेरा भी उनके साथ कोई दो दशकों से इसी रूप में परिचय रह...
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क्या प्रधानमंत्री 2024 को लेकर इतने चिंतित हैं ? - श्रवण गर्ग गुरु नानक देव साहब के ‘ प्रकाश पर्व ’ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र के नाम संदेश का सार यही है कि उन्होंने कहीं से यह स्वीकार नहीं किया कि कृषि क़ानूनों में किसी प्रकार की त्रुटि अथवा किसानों का अहित निहित है / था। उनके कहे को इस प्रकार से समझा जा सकता है :’ देश के कोने - कोने - कोने में कोटि - कोटि किसानों ने , अनेक किसान संगठनों ने इसका स्वागत किया। …… भले ही किसानों का ...