क्या ‘मैं वापस आऊँगा’ भी एक एजेंडा फ़िल्म है ?
-श्रवण गर्ग
प्रसिद्ध पाकिस्तानी फ़िल्ममेकर उमर नासिर अली ने इम्तियाज़ अली की बहुचर्चित फ़िल्म ‘ मैं वापस आऊँगा‘ को अत्यंत भावनात्मक और मास्टरक्लास करार देते हुए कहा है कि फ़िल्म ख़त्म हो जाने के भी काफ़ी समय तक दर्शकों के साथ बनी रहती है ! ‘
‘नायाब’ जैसी फीचर फ़िल्म के लिए पहचान रखने वाले उमर नासिर से क्या पूछा जा सकता है कि पार्टीशन को लेकर ऐसी ही कोई फ़िल्म क्या वे पाकिस्तान में बना सकते हैं ? ऐसी फ़िल्म जिसमें लोकेशन सरगोधा की ही हो पर इम्तियाज़ की फ़िल्म के 95 साल के सिख मुख्य नायक (ईशर सिंह ग्रेवाल ) की जगह कोई मुस्लिम हो जिसके अधूरे प्यार की नायिका कोई सिख युवती पार्टीशन के बाद भारत के हिस्से वाले पंजाब के किसी शहर में बस गई हो और जिसे तलाशने उसका पोता सीमा पार करके भारत आता हो ? क्या फ़िल्म पाकिस्तान में बनाने दी जाएगी ? क्या ऐसी कोई फ़िल्म भारत में रिलीज़ होने दी जाएगी ?
ईशर सिंह ग्रेवाल उर्फ़ कीनू की 78 साल पुरानी प्रेम कहानी हक़ीक़त में उन ज़ख्मों को ही हरा करती है जिन्हें वे सत्तर लाख से ज़्यादा लोग जो पार्टीशन के बाद गठरियों में बांधकर भारत पहुँचे थे अब भूल जाना चाहते हैं। तो फिर क्या बहस फ़िल्म को एक अधूरे प्यार की कहानी की क़ैद से आज़ाद कर उसकी स्क्रिप्ट में डाले गए ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ की तरह के हिंसक दृश्यों या शरणार्थियों से भरी ट्रेनों के अमृतसर पहुँचने के स्टॉक फूटेज के इस्तेमाल की ज़रूरत या निर्माताओं के इरादों पर भी नहीं की जानी चाहिये ?
सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है। अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?
दर्शकों की तरफ़ से हम यह मानकर चलना चाहते हैं कि अगर फ़िल्म में यह सब शामिल नहीं किया जाता तो फिर पूरी कहानी युवा ईशर के सरगोधा में इश्क़ के शॉट्स, पोते निर्वेर (दिलजीत दोसांझ) के इंग्लैंड से लौटकर भारत आने और सीमा पर करके सरगोधा जाने के दृश्यों और ईशर (नसीरूद्दीन) के घर और अस्पताल के बिस्तरों पर व्यक्त हुई अधूरे प्रेम की स्मृतियों तक बंध कर रह जाती ! यानी असली फ़िल्म इंटरवल के बाद शुरू होती ! पर पार्टीशन की व्यथा को कमर्शियली बेचने के लिए तीन घंटे तक खींचा जाना ज़रूरी था।
हक़ीक़त यह है कि पार्टीशन की हिंसक स्मृतियों को अगर इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाए तो फिर न तो सत्ता की सांप्रदायिक राजनीति को चुनावी बारूद मिलेगा और न मुंबइया फ़िल्मों के लिए कहानियाँ।फ़िल्म के शुरुआती हिस्से में जब पार्टीशन की खबर सरगोधा पहुँचती है तो युवा ईशर पहले यह डायलॉग बोलता है: मैं बटवारे को नहीं मानता’ ! जब उसे ज़बरदस्ती ट्रेन पर चढ़ाकर सीमापार धकेला जाने लगता है तो अपने प्यार से वह वादा करता है :’ मैं वापस आऊँगा’ !
ईशर( नसीरूद्दीन) के 78 साल तक प्यार में डूबे रहने और किए गए वायदे के मुताबिक़ वापस नहीं पहुँच पाने की कहानी का अदृश्य भाग यह है कि पार्टीशन को न सिर्फ़ स्वीकार कर लिया गया है उसके ज़ख्मों को बार-बार कुरेदकर गहरा करते रहना भी वक्त की ज़रूरत बन गया है।
पार्टीशन को लेकर बनाने वाली फ़िल्में अधूरे प्रेम की पीड़ा और बेबसी को जिस अन्दाज़ में उजागर करती हैं अपनी स्क्रिप्ट्स में एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान के लिए नफ़रत की गुंजाइशें भी छोड़ती जाती हैं। इम्तियाज़ भी अगर उस गुंजाइश को नहीं छोड़ते तो फिर फ़िल्म में ग्लोरिफ़िकेशन सिर्फ़ दो कोमों के युवा प्रेमियों के बीच पनपे निश्चल प्रेम का ही होता उससे इतर कुछ नहीं। वैसी स्थिति में फ़िल्म दिलजीत दोसांझ की सरगोधा यात्रा के शॉट्स के बाद नसीरूद्दीन शाह के चेहरे पर छाने वाली शांति के अंतिम दृश्य पर ख़त्म कर दी जाती ! वैसा नहीं किया गया ! नसीरुद्धीन की शानदार भूमिका को ओवरशैडो करते दोसांझ के गाने ‘कमाल है ‘ के साथ फ़िल्म का अंत दिखाया गया। एक मार्मिक प्रेम कहानी पर ग़ज़ा के विज़ुअल्स की ग़ैरज़रूरी बमबारी के बारे में किसी भी समीक्षक ने सवाल नहीं किया !
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