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  उत्पीड़न  से  लड़ाई   का  ‘ असहमति ’ के  साथ   बँटवारा   श्रवण   गर्ग   वह   अकेली   औरत   कौन   है  / जो अपने  चेहरे   को   हथेलियों   में   भींचे  / और   सिर   को   घुटनों   पर   टिकाए   हुए / उस   सुनसान   चर्च   की   आख़िरी   बेंच के  कोने   पर   बैठी   हुई  / सुबक - सुबककर     रो   रही   है  ? वह   औरत   कोई   और   नहीं / हाड़ - माँस   का   वही   पुंज   है  / जो   ईसा   को   उनके  ‘ पुरुष शिष्यों  द्वारा   अकेला   छोड़   दिए   जाने   के   बाद  / उनकी   ढाल   बनकर   अंत   तक   उनका   साथ   देती   रही  / जो   उनके   पुनरुज्जीवन   के   समय   भी उनके  साथ   ही   उपस्थित   हुई   थी ...