‘सीट नंबर 11-A’ -श्रवण गर्ग वह शख़्स जो बैठा हुआ था सीट नंबर पर 11-A पर हाल तक क्यों रो रहा है इस तरह होकर तार-तार ,लगातार ! कौन सा दुख है जो साल रहा है उसे ? मौत को मात देकर भी ख़ुश नहीं है वह ! खामोश क्यों नहीं है हुकूमत की तरह ? साध लेती है जैसे चुप्पी हरेक हादसे के बाद बुझी हुई राख की तरह ! क्या किया जाएगा अब उस सीट का ? निकाला जाएगा कि नहीं मलबे के ढेर से बाहर ? फोरेंसिक जांच के लिए ! बेचने के लिए नीलामी में ! बनाने के लिए कोई स्मारक दिलाने यकीन कि नहीं हो जाता खत्म सबकुछ एक हादसे में ! बच जाता है एक इंसान, एक सीट ! हो सकता है डर रहे हों हुक्म के ताबेदार मौजूदगी से उस बेजान सीट की ! उस पर लिपटी राख से ! फिर सवाल यह भी तो है ! कैसे चल पाएगा पता, कहाँ होगी वह एक सीट इतने विशाल मलबे में ? क्या बचा भी पाई होगी वह अपने आपको ? एक बेजान सीट को बचाया जाना वैसे भी ज़रूरी नहीं ! पूछने लगेगा तब अवाम मुल्क का ! हुकूमतें बदली नहीं जा सकतीं आसानी से क्या नहीं किया जा सकता बस इतना भर ! कर दिया जाए हरेक इंसान का नंबर 11-A ?
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मोदी जी इस समय क्या सोच रहे होंगे ? - श्रवण गर्ग यह वह जगह है जो गुरुवार को दिन के एक बजकर अड़तीस मिनिट तक हज़ारों लोगों की चहल - पहल से आबाद थी। हम सोचते होंगे कि एक बड़ी जगह के दो मिनिटों में इस तरह श्मशान में बदल जाने बाद कहीं ठहरते तो कहीं रुकते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन में क्या विचार उठ रहे होंगे ? वे कुछ तो ज़रूर सोच रहे होंगे ! ग्यारह सालों की दिल्ली में हुकूमत के दौरान इतनी बड़ी राष्ट्रीय दुर्घटना पहली बार...