चापलूसी और झूलेबाज़ी के ज़रिए विदेश नीति के असफल प्रयोग !


-श्रवण गर्ग 


डॉनल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा की विफलता के कारणों को लेकर अमेरिकी मीडिया में जो विश्लेषण प्रकाशित हो रहे हैं हमारे लिए इस नज़रिए से चौंकानेवाले हो सकते हैं कि उनके निष्कर्षों को विदेश नीति के मोर्चों पर प्रधानमंत्री मोदी की असफलताओं के साथ भी नत्थी किया जा सकता है ! भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया (कुछ अपवादों को छोड़कर) चूँकि पूरी तरह से कंप्रोमाइज्ड या आतंकित है अपनी चर्चाओं में मोदी की विदेश यात्राओं की विफलताओं के असली कारणों की निष्पक्ष तरीक़ों से चीर-फाड़ नहीं करता !


मोदी चूँकि मीडिया का सामना नहीं करते (ताज़ा उदाहरण नॉर्वे का है) ट्रम्प की तरह उनसे सवाल नहीं किए जा सकते कि सत्ता में पिछले बारह सालों के दौरान सौ के क़रीब पहुँच रही विदेश यात्राओं से ‘इण्डियन डायस्पोरा’ में विपक्ष की आलोचना पर तालियों की गड़गड़ाहट के अतिरिक्त वे और क्या वापस लेकर लौटे हैं ? 


ट्रम्प ने अपनी दो-दिनी यात्रा में चीनी राष्ट्रपति शी के साथ नौ घंटों तक उन तमाम मुद्दों पर बातचीत की जो दुनिया के दो शक्तिशाली राष्ट्रों के बीच तनाव का कारण बने हुए हैं । जैसे : खाड़ी का युद्ध, ताइवान, यूक्रेन, एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), ईरान का परमाणु कार्यक्रम,आदि)। सिवाय इस आशय के अपुष्ट आश्वासनों के कि चीन अमेरिका से बोइंग विमान (संख्या तय नहीं कि दो सौ,पाँच सौ या साढ़े सात सौ) ,सोयाबीन और कच्चा तेल ख़रीद सकता है किसी ऐसी बात पर सहमति व्यक्त नहीं हुई जिससे कि व्याप्त तनाव समाप्त अथवा कम हो जाए ! 


चीन यात्रा की विफलता के संबंध में ट्रम्प के व्यक्तित्व से जुड़े जिन कारणों को मीडिया के विश्लेषणों में गिनाया जा रहा है उनमें उनके पहले कार्यकाल (2017-‘21)में उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के साथ हुई बातचीत और वर्तमान कार्यकाल में यूक्रेन मुद्दे पर पुतिन के साथ अलास्का में हुई शीर्ष वार्ता के निराशाजनक परिणामों को भी जोड़ा जा रहा है।ट्रम्प से चर्चा के बाद न तो उत्तरी कोरिया ने अपना परमाणु विस्तार का कार्यक्रम रोका और न पुतिन ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ कार्रवाई बंद की ! 


ट्रम्प की विफलताओं और मोदी की यात्राओं के सीमित परिणामों को इसलिये साथ जोड़कर देखा जा सकता है कि दोनों ही नेता बजाय पर्याप्त कूटनीतिक तैयारी के साथ यात्राओं पर जाने के ,सिर्फ़ अपने आक्रामक व्यक्तित्व, दृढ़ इच्छा-शक्ति और मेज़बान शासनाध्यक्षों की तारीफ़ों के पुलों के प्रदर्शनों के ज़रिए ही उन पर हावी होकर सबकुछ प्राप्त कर लेना चाहते हैं।


उत्तरी कोरिया के तानाशाह से मुलाक़ात के दौरान ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया था कि उनके और किम के बीच संबंध कितने प्रेमपूर्ण हैं।पुतिन से अलास्का में मिलने से पहले ट्रम्प ने उन्हें कई बार फ़ोन किए थे। बातचीत के बाद कहा गया था कि दोनों नेताओं के बीच अगली बातचीत मॉस्को में होने वाली है। ट्रम्प तो मॉस्को नहीं जा पाए पुतिन बीजिंग अवश्य पहुँच गए।


विश्लेषणों के मुताबिक़, बीजिंग में भोज के दौरान ट्रम्प ने कहा शी उनके दोस्त हैं। हक़ीक़त में दोस्त बन गए हैं। दूसरी ओर, चीनी राष्ट्रपति ट्रम्प के इन इरादों से परिचित थे कि तारीफ़ों के पुल बांधने और शो बाज़ी के मार्फ़त ही वे अमेरिका की सारी समस्याओं के हल चाहते हैं। 


अमेरिकी विश्लेषकों के अनुसार ,व्यक्तिगत केमिस्ट्री को लेकर एक बड़ी गलती वहाँ हो जाती है जब एक शगसनाध्यक्ष तो किसी प्रजातांत्रिक मुल्क का हो और दूसरा किसी अधिनायकवादी व्यवस्था का। जो केमिस्ट्री शी और पुतिन या किम-पुतिन-शी के बीच आसानी से स्थापित हो जाती है वह ट्रम्प और शी के बीच हो ही नहीं सकती। चीन,रूस और उत्तरी कोरिया के घाघ शासकों को सिर्फ़ शो बाज़ी अथवा तारीफ़ों के झूलों पर झुलाकर नहीं जीता जा सकता !


ट्रम्प की चीन यात्रा को लेकर ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के एक विश्लेषण में कहा गया  है अमेरिकी राष्ट्रपति सिर्फ़ चापलूसी के दम पर शी को जीतना चाहते थे जो कि संभव नहीं था। ट्रम्प अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बिल क्लिंटन जैसी पूर्व कूटनीतिक तैयारी के साथ चीनी नेता से नहीं मिले थे। विदेश नीति में सिर्फ़ प्रभावशाली व्यक्तित्व का होना ही आवश्यक कूटनीतिक तैयारी की ज़रूरत का स्थान नहीं ले सकता। इसीलिए जब-जब ट्रम्प शी की टैरिफ में क़सीदे पढ़ते थे ,चीनी राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया संतुलित और गंभीर होती थी। वे जानते थे कि उनके एक-एक हावभाव पर पूरी दुनिया की नज़रें तैनात हैं। मोदीजी भी शायद गलती यहीं कर रहे हैं।


ट्रम्प की लोकप्रियता अमेरिका में घटती जा रही है और कथित  तौर पर भारत में मोदीजी की भी।’न्यूयॉर्क टाइम्स’ द्वारा हाल ही में किए गए ओपिनियन पोल के अनुसार,अमेरिका के 64 प्रतिशत नागरिकों ने ईरान के ख़िलाफ़ की गई ट्रम्प की कार्रवाई को ग़लत बताया है। बीजिंग में भव्य अगवानी करने से पहले चीनी राष्ट्रपति को निश्चित ही ट्रम्प की गिरती लोकप्रियता की जानकारी रही होगी। मोदीजी की लोकप्रियता को लेकर इस तरह का कोई निष्पक्ष ओपिनियन पोल भारत में तो करवाया ही नहीं जा सकता !

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