एक अखबारी रिपोर्ट पर इतना बड़ा भूकंप ? यक़ीन नहीं होता !
-श्रवण गर्ग
छप्पन इंच की बहादुर सरकार अचानक से इतनी डरी-डरी क्यों दिख रही है ? सिर्फ़ तीन दिन में उसका हुलिया बदला गया ! वह भूकंप आ गया जो पिछले बारह सालों में नहीं आया ! यकीन से परे है कि सिर्फ़ एक अखबारी रिपोर्ट पर इतनी शक्तिशाली हुकूमत के पाये इस तरह हिलते नज़र आने लगें ! ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ !
पंद्रह-बीस करोड़ सदस्यों वाली दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी सिर्फ़ बहत्तर घंटों में अपनी इस घोषणा को कैसे भूल-सी गई कि वह प्रधानमंत्री का छहत्तरवाँ जन्मोत्सव एक महीने तक देश भर में मनाएगी ? ऐसा क्या हो गया कि ज्ञानेश गुप्ता के नेतृत्व में छुट्टी के दिन शनिवार को हुई मीटिंग में आयोग ने अपने ही पिछले फ़ैसलों को उलटने या नये सिरे से लागू करने का तय कर लिया ! क्या इसआरोप को मंज़ूर कर लिया कि पुराने फ़ैसले एक ही व्यक्ति द्वारा मनमानीपूर्ण तरीक़े से लिए गए थे ? अगर ऐसा है तो ऐसा किसके इशारे पर हो रहा था ? इस्तीफ़ा किसका माँगा जाना चाहिए ?
जो चल रहा है उसे केवल किसी एक मीडिया संस्थान की ताक़त या एक रिपोर्टर की खोजपूर्ण खबर का ही परिणाम नहीं माना जाना चाहिए ! अंग्रेज़ी में एक कहावत है : ‘there is more to this than meets the eye’. यानी मामला ऊपर से जैसा देखने में लग रहा है उससे कहीं अधिक गहरा या अलग है। मीडिया अगर इतना ही पावरफुल था तो बारह सालों से सरकार ख़ामोश क्यों बना रही ? कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ-दुर्घटनाएँ हुईं ! सत्ता के गलियारों में जूँ तक नहीं रेंगी ! नोटबंदी हुई, पुलवामा हुआ, गलवान हुआ, पहलगाम हुआ,ऑपरेशन सिंदूर हुआ ! पुल गिरे, ट्रेन एक्सीडेंट्स हुए, विमान दुर्घटना हुई। कई लोग मारे गए।महिला खिलाड़ियों का यौन शोषण हुआ। किसानों द्वारा आत्महत्याएँ हुईं ! क्या-क्या नहीं हुआ ? सब कुछ मोटे-मोटे अक्षरों में छपा भी !
जिस प्रधानमंत्री ने अपने अब तक के कार्यकाल में एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की हो ; जिस मुल्क के लगभग सभी प्रमुख टीवी चैनल्स सत्ताभिमुख पूँजीपतियों द्वारा ख़रीद लिए गए हों ;अख़बारों के रीढ़ की हड्डियाँ बड़े-बड़े माल्स में तब्दील हो चुकी हों, उसमें यह मुमकिन ही नहीं कि सत्ता के पायों को एक ऐसे अख़बार की रिपोर्ट ही हिला दे जिसकी ख़ुद की विश्वसनीयता संदिग्ध बन चुकी हो ! तो क्या किन्हीअज्ञात कारणों के चलते भी सबकुछ इतने चमत्कारिक ढंग से घटित हो रहा है ? तो फिर भूकंप का केंद्र बिंदु कहाँ होना चाहिए ? देश में ही कहीं कि बाहर ?
जो हो रहा है या होने जा रहा है उसकी इबारतें सत्तारूढ़ दल के नेताओं के चेहरों पर बढ़ते क्रोध में भी पढ़ी जा सकती हैं। दिल्ली सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री और किसी वक्त मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे प्रवेश वर्मा ने रविवार को विपक्षी पार्टी (आप) के एक विधायक के युवा प्रतिनिधि को सारे आम थप्पड़ केवल इसलिए जड़ दिया कि वह मंत्रीजी के मुआयने के दौरान ख़राब निर्माण कार्य की रील बना रहा था। यह ग़ुस्सा अभी और बढ़ने वाला है।मोदीजी के राज में सत्ता का विकेंद्रीकरण तो नहीं हुआ पर क्रोध का होता दिख रहा है।
बीजेपी के चेहरे का नूर उतर रहा है और विपक्ष की आक्रामकता बढ़ रही है ! चल रहे घटनाक्रम के बीच मोदीजी ने योगी आदित्यनाथ के साथ ऐसी क्या बातचीत की होगी जो घंटे भर चली होगी ? क्या बातचीत चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर हुई होगी कि ज्ञानेश गुप्ता यूपी के चुनावों तक अपनी सेवाएँ दे पाएँगे कि नहीं ? क्या विपक्ष उन्हें बने रहने देगा ? यूपी चुनावों में हरियाणा, बिहार, बंगाल रिपीट नहीं हुआ तो क्या पार्टी हार जाएगी ? बीजेपी के भविष्य की चाबी संघ और योगी की तरफ़ तो नहीं खिसकने वाली है ? पूरी पिक्चर में अमित शाह कहाँ हैं ?
विदेश में सहारा कमज़ोर पड़ रहा है, और इसका असर सीधा घर की सियासत पर पड़ सकता है। नेतन्याहू का करप्शन ट्रायल अभी भी चल रहा है और उनकी कुर्सी कानून के फ़ैसले पर टिकी है। उधर ट्रंप के लिए मिडटर्म ख़तरे की घंटी हैं — मार्केट्स डेमोक्रेट स्वीप की तरफ़ झुक रहे हैं, हाउस लगभग हाथ से जा चुका है और सीनेट भी डगमगा रही है, यानी लेम डक बनने का पूरा चांस बन रहा है।
ReplyDeleteमाना जाता है इन दोनों के पास "56" के ख़िलाफ़ कुछ पत्ते हैं, तो इनका कमज़ोर पड़ना फ़ायदे की बात लगनी चाहिए — पर है नहीं। कमज़ोर आदमी के राज़ ग़ायब नहीं होते, बस मालिक बदल जाता है, और नए हाथों का दबाव पुराने से ज़्यादा अनप्रेडिक्टेबल होगा। यह स्पिलओवर उल्टा भी पड़ सकता है।
दूसरा मोर्चा एल्गोरिद्म का है। भारत को परोक्ष सपोर्ट देने वाले टेक सीईओज़ की वफ़ादारी पावर के साथ चलती है, प्रिंसिपल के साथ नहीं, और सत्ता पलटी तो यू-टर्न लेने में एक सेकंड नहीं लगेगा। यह मायने इसलिए रखता है क्योंकि भारत का युवा टीवी नहीं, एल्गोरिद्म से जीता है, और असंतोष पहले से बढ़ रहा है। नैरेटिव कंट्रोल ढीला पड़ा तो अगला हादसा सीधे "56" के खाते में जाएगा।
राहुल गांधी को कोई सीक्रेट फ़ाइल नहीं चाहिए। बस इतना पता है कि हवा पलट चुकी है, और वो सिर्फ़ चिंगारी को हवा दे रहे हैं। कहानी छोटी है — बाहर का सहारा टूटा, तो अंदर का तख़्त हिलेगा।