राहुल के लोग जेपी को ‘हरामी’ बता रहे हैं और मैं चुप हूँ !
-श्रवण गर्ग
‘लोकनायक’ जयप्रकाश नारायण (जेपी) का आज जन्मदिन है।मेरे एक पच्चीस साल पुराने पत्रकार मित्र ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जेपी के चित्र के साथ किसी अन्य व्यक्ति द्वारा लिखे गए आलेख को टैग करते हुए टिप्पणी की है :’भारत के लोकतंत्र और संविधान के क़त्ल का असली साज़िश करता यही सीआईए एजेंट जय प्रकाश नारायण था।थू है इस हरामी पर।’पत्रकार मित्र का नाम जान-बूझकर नहीं दे रहा हूँ।
मैंने जेपी के सान्निध्य में जीवन के कई महत्वपूर्ण साल बिताए हैं। 1974 के बिहार के आंदोलन में भाग लिया है। उसके भी पहले 1972 में चंबल घाटी और बुंदेलखंड में हुए सैंकड़ों दस्युओं के आत्मसमर्पण का उनके साथ साक्षी रहा हूँ।उनके साथ कई स्थानों की यात्राएँ की हैं। इस सबकी स्मृतियाँ पिछले पचास से अधिक सालों से सहेजे हुए हूँ। पत्रकार मित्र की टिप्पणी पर खून तो खौला पर मन को शांत कर लिया।
पत्रकार मित्र राहुल गांधी के कट्टर वाले समर्थक हैं।चौबीसों घंटे राहुल के मीडिया सेल की तरह काम करते हैं। राहुल की लीगल टीम उनकी मदद भी करती रहती है। उनके राहुल के साथ गले मिलते चित्र भी हैं। जेपी के ख़िलाफ़ इस तरह की टिप्पणियाँ करने वाले वे अकेले नहीं होंगे। राहुल की टीम में और कई हो सकते हैं। राहुल का राजनीतिक क़द जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा जेपी के ख़िलाफ़ लिखने-बोलने वालों की संख्या भी बढ़ती जाएगी।
मेरा मानना रहा है राहुल एक ग़ुस्सेल क़िस्म के व्यक्तित्व हैं।वे अपने ग़ुस्से को दबाए रखते हैं।नापसंद व्यक्तियों, संस्थाओं और कड़वे अतीत के प्रति गाँठ बांधकर काम करते हैं। राहुल के इर्द-गिर्द ऐसा मज़बूत चक्रव्यूह बन गया है जिसे भेदकर उनके नज़दीक पहुँचा नहीं जा सकता। उनके कई सहयोगी कांग्रेस छोड़कर अन्य दलों की शरण लेने के कारणों में राहुल की इस कमज़ोरी को भी बातचीत में गिनाते रहे हैं।
जेपी के प्रति राहुल के मन में अगर कोई श्रद्धा नहीं है या ग़ुस्सा है तो मैं उन कारणों का विश्लेषण कर सकता हूँ। राहुल तब सात साल के रहे होंगे जब जेपी के आंदोलन के कारण इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर जाने पर मज़बूर होना पड़ा था। भारत के इतिहास का यही वह अद्भुत क्षण भी था जिसके कारण केंद्र में एक-पार्टी की हुकूमत का अंत होकर देश में ग़ैर-कांग्रेसवाद की जो शुरुआत हुई वह आज तक बनी हुई है।
इंदिरा गांधी आपातकाल इसलिए लागू कर पाईं थीं कि देश के कुछेक राज्यों को छोड़कर जहां राष्ट्रपति शासन था लगभग पूरे देश में कांग्रेस की ही सरकारें थीं। उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों और केरल में विपक्षी सरकार थी। नरेंद्र मोदी के लिए आज वैसी अनुकूल स्थिति नहीं है अन्यथा वे इंदिराजी से भी आगे बढ़कर कुछ कर देते।
राहुल गांधी हाल के सालों में कम से कम दो बार पटना की यात्रा पर जा चुके हैं। हो सकता हैं ज़्यादा बार भी गए हों। पहली यात्रा ‘इंडिया ब्लॉक’ के कांक्लेव के सिलसिले में हुई थी तब नीतीश मुख्यमंत्री थे।दूसरी यात्रा बिहार विधानसभा चुनावों के समय तेजस्वी के साथ वोटर रैली में भाग लेने के लिए हुई थी।
दोनों ही यात्राओं के समय मैंने उम्मीद की थी कि सत्ता-परिवर्तन के जिस आंदोलन का राहुल नेतृत्व कर रहे हैं और जिसमें इंदिराजी को सत्ता से हटाने वाले बिहार छात्र आंदोलन के प्रमुख सिपाही लालू यादव भी उनके साथ जुड़े हैं उसमें जेपी के नाम का स्मरण अवश्य किया जाएगा। राहुल पटना में जेपी के कदम कुआँ स्थित निवास स्थान पर पहुँचकर उन्हें श्रद्धांजलि भी अवश्य देंगे। राहुल नहीं गये।
राजस्थान के चूरु में ‘अणुव्रत’ आंदोलन के प्रणेता आचार्य तुलसी की पुस्तक ‘अग्नि परीक्षा’ को लेकर हिंसा हो गई थी। हिंसा को शांत करने के लिए जेपी और प्रभावतीजी से चूरु की यात्रा करने का निवेदन किया गया था। जेपी ने मुझे भी साथ चलने को कहा था।हम लोग पुरानी दिल्ली के स्टेशन से ट्रेन द्वारा वहाँ पहुँचे थे। एक शाम चूरु शहर के बाहर पैदल भ्रमण के दौरान चर्चा में मैंने जेपी से पूछ लिया था कि इंदिरा सरकार द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ताम्रपत्र आदि दिये जा रहे हैं। क्या सरकार आपको स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती ? जेपी कुछ क्षण ख़ामोश रहे फिर धीरे से बोले थे कि हो सकता है नहीं मानती हो !
राहुल अगर पीएम बन गए तो हो सकता है अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा जेपी को मरणोपरांत दिये गए ‘भारत रत्न’ अलंकरण को वापस लेने की उनसे माँग की जाए। जैसे-जैसे राहुल की लोकप्रियता बढ़ रही है राहुल के आभामंडल में टिमटिमा रहे छोटे-मोटे सितारों का अहंकार भी बढ़ता जा रहा है। यह सब उनकी भाषा और बॉडी लैंग्वेज में पढ़ा भी जा सकता है। जेपी पर अपमानजनक आलेख और टिप्पणी उदाहरण है।
मेरे जैसे और भी तमाम लोग होंगे जो इस समय राहुल का समर्थन सिर्फ़ इसलिए समर्थन कर रहे हैं कि वे अपनी जान की भी परवाह नहीं करते हुए देश में लोकतंत्र की बहाली और संविधान की रक्षा के काम में जुटे हुए हैं। राहुल अगर सत्ता में आ गए तो बहुत मुमकिन है हमें उनका भी उसी तरह से विरोध करना पड़े जिस तरह से पहले इंदिरा गांधी के घोषित ‘आपातकाल’ और वर्तमान में नरेंद्र मोदी के ‘अघोषित आपातकाल’ का कर रहे हैं। इस तरह की संभावनाओं को मैं निरस्त भी नहीं करना चाहता।
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