क्या यह मोदीजी की लोकप्रियता पर ‘ओपिनियन पोल’ है ?


-श्रवण गर्ग 


दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र के सबसे बड़े राजनीतिक दल बीजेपी को अपने प्रधानमंत्री का 76वाँ जन्मदिन इस तरह से क्यों मानना पड़ रहा है ? कोई तो बड़ा कारण होना चाहिए कि 17 सितंबर 2025 को उम्र के पचहत्तर साल पूरे करने पर उनके जन्म की ‘डायमंड जुबली’ उतने धूमधाम से नहीं मनाई गई जिस तरह से सार्वजनिक जीवन में सेवा के पच्चीस साल( सत्ता में पच्चीस साल नहीं कहा जा रहा है?) पूरे करने के नाम पर मोदीजी के 76वें जन्मदिन को मनाया जा रहा हैं ! 


बीजेपी ने शायद कल्पना नहीं की होगी कि पिछले और इस जन्मदिन के बीच देश-जीवन में इतनी उथल-पुथल मच जाएगी कि सड़कें सड़कें सरकार-विरोधी आंदोलनों से पट जाएँगी और संसद का एक पूरा सत्र ही पीएम और गृहमंत्री की अनुपस्थिति में गुज़र जाएगा।2014 में सत्ता में आने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है। 


जो चल रहा है उसे देखते हुए इस आशय की चर्चाओं पर आश्चर्य नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अब तत्काल नवाज़ दिया जाए।अहमदाबाद में निर्मित हुए देश के सबसे बड़े स्टेडियम का नामकरण मोदीजी के नाम पर पहले ही किया जा चुका है।


इस बात का उल्लेख करना शायद प्रासंगिक हो कि संघ प्रमुख मोहन भागवत का 76 वाँ जन्मदिन अभी छह दिन पहले (11 सितंबर) पूरे सन्नाटे में गुजर गया। कहीं कोई चर्चा नहीं हुई ! क्या कारण रहा होगा ? संघ-प्रमुख के 75वें जन्मदिन पर तो प्रधानमंत्री ने एक विशेष आलेख साझा किया था जिसमें  उनके प्रेरक जीवन और राष्ट्र-सेवा के प्रति उनकी अटूट आस्था का उल्लेख किया गया था। इस बार ? 


इस बार आलेख प्रधानमंत्री के बारे में प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ हरीश साल्वे ने लिखा है। एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ी अख़बार के संपादकीय पृष्ठ पर आधे पन्ने में प्रकाशित आलेख (Modi Doctrine : Stability Amid Disorder) में बताया गया है कि मोदीजी  के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक झटकों (global shocks) का सामना करते हुए कैसे स्थिरता और प्रगति हासिल की है ।


पीएम के 76 वें जन्मदिन को लेकर जो चल रहा है वह आश्चर्य में डालने वाला है। वह इसलिए कि वर्तमान में देश जिस तरह के आर्थिक-राजनीतिक संकटों से गुज़र रहा है, नागरिकों में जैसा असंतोष व्याप्त हैं उस सबके बीच भी बीजेपी द्वारा अपने पीएम के जन्मदिन को इतने व्यापक तरीक़े से मनाया जाना संदेह उत्पन्न करता है कि सरकार के भीतर कुछ दरक तो नहीं रहा है ? कहीं कुछ कमज़ोर तो नहीं पड़ रहा है ? BRICS के विशाल आयोजन के तत्काल बाद प्रधानमंत्री की छवि निखारने के लिए इस तरह के उपक्रम की ज़रूरत क्यों पड़ना चाहिए ? 


बड़ा सवाल यह भी है कि अपने प्रधानमंत्री के जन्मदिन को लेकर देश के ही नागरिकों में दीये जलाने का उस तरह का उत्साह क्यों नहीं है जैसा कि ‘कोविड’ के समय देखा गया था ? जन्मदिन को लेकर सारा उत्साह मोदीजी के प्रति समर्पित केंद्रीय मंत्रियों और कमज़ोर मुख्यमंत्रियों की अपीलों और बड़े-बड़े विज्ञापनों तक ही क्यों सिमट रहा है ? 


क्या जन्मदिन के आयोजन को जनता के बीच प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ‘ओपिनियन पोल’ मान लिया जाए ?अगर ऐसा है तो मुमकिन है मोदीजी का जन्मदिन अब 2029 के लोकसभा चुनावों तक हर साल इसी तरह या और भी भव्य पैमानों पर मानना पड़ेगा ! भय व्यक्त किया जा सकता है कि आम जनता के जीवन की कठिनाइयों में वृद्धि के साथ-साथ जैसे-जैसे प्रधानमंत्री और सरकार की लोकप्रियता कम होती जाएगी इस तरह के आयोजन भी बढ़ते जाएँगे ! 



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