क्या तूफ़ान मचने वाला है दिल्ली की सड़कों पर आज ?


-श्रवण गर्ग 


ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर मोदी-शाह की सत्ता से टकराने की फ़ाइनल जंग क्या आज (सोमवार) से दिल्ली की सड़कों पर प्रारंभ होने वाली है ? राहुल गांधी उसके पहले विपक्षी सहयोगियों के साथ मिलकर देश की आख़िरी संवैधानिक संस्था सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटा कर उसे सूचित करना चाहते थे कि अपेक्षित न्याय न प्राप्त होने की स्थिति में किसी भी शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक कार्रवाई के लिये विपक्ष और जनता को दोषी नहीं ठहराया जाए। देर रात बताया गया कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने विपक्ष के नेता को SIR से संबंधित मुद्दों पर चर्चा के लिए मुलाक़ात का समय देने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। 


राहुल ने अपनी पहली कोशिश निर्वाचन आयोग पहुँचकर मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके दोनों सहयोगी आयुक्तों से मिलकर वोट चोरी की शिकायत दर्ज कराने की थी।विपक्षी सांसदों को ने सिर्फ़ उनसे मिलने नहीं दिया गया, उन्हें बलपूर्वक उठाकर बसों में भर दिया गया।उसके अगले दिन जंतर मंतर पहुँचकर विरोध प्रकट करने के लोकतांत्रिक अधिकार से भी निर्वाचित सांसदों को वंचित कर दिया गया। 


राष्ट्र की सर्वोच्च संवैधानिक पीठ राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के समक्ष जब शिकायत दर्ज कराई गई तो उनसे कहा गया कि आरोपों की  पुष्टि के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध करा दें।जाँच करवा ली जाएगी। विपक्ष द्वारा न्याय-प्राप्ति के लिये अंतिम दरवाज़ा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अदालत में पहुँचकर आज खटखटाया जाने वाला था। 


देश के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि जनता की ओर से अंतिम लड़ाई के लिए सड़कों पर उतरने से पहले आंदोलनकारी विपक्ष सभी संभावित संवैधानिक ठिकानों पर दस्तक देकर अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी पूरी कर लेना चाहता था। उसे सफलता नहीं मिली।


न्यायमूर्ति सूर्यकांत की ओर से मुलाक़ात के लिये समय की प्रार्थना ख़ारिज होने से पूर्व दिन में सोशल मीडिया पर जारी अपनी एक पोस्ट में राहुल गांधी ने कहा था कि वे देश के मुख्य न्यायाधीश से जानना चाहेंगे कि जब दिल्ली की सड़कों पर संविधान की धज्जियाँ उड़ रही है, लोकतंत्र को कुचला जा रहा है संविधान के रक्षक आँखों पर पट्टियां बांधकर तो नहीं बैठे हुए हैं !! राहुल ने आगे पूछा कि संविधान को तार-तार  होते देख वे क्या ख़ामोश बैठने वाले हैं ? ऐसा नहीं होने देंगे ! जवाबदेही तय की जाएगी !


इसी बीच, कपिल सिब्बल ने ऐसा क्यों कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगा-लगाकर वे थक गए हैं ? उन्हें ऐसा क्यों लगने लगा है कि सुप्रीम  कोर्ट जाने का कोई मतलब नहीं बचा है ? ‘मेरा विश्वास ख़त्म हो चुका है !” देश में संविधान की रक्षा सुप्रीम कोर्ट के अलावा और कोई  नहीं कर सकता । अब जो भी होना होगा हो जाएगा ! ‘मेरा भरोसा नहीं रहा !’


सवाल यह है कि मुख्य न्यायाधीश के इंकार के बाद भी क्या राहुल अपने सहयोगियों के साथ सुप्रीम कोर्ट का रुख़ करना चाहेंगे या किसी ओर ठिकाने की तरफ़ कूच करेंगे ? राहुल रविवार को यह ऐलान तो कर ही चुके हैं कि विपक्षी गठबंधन के सहयोगियों और देश के युवाओं के साथ कांग्रेस सोमवार को एक बार फिर सड़कों पर उतरने वाली है। उनकी आवाज़ देश के कोने-कोने में पहले से ज़्यादा ज़ोर से गूंजने वाली है। 


राहुल ने गृहमंत्री अमित शाह को चुनौती देते हुए यह भी कह दिया था कि उनकी जितनी मर्ज़ी हो उतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती कर दें। दस हज़ार, बीस हज़ार, चालीस हज़ार। संघ और बीजेपी के गुंडों को भी झोंक दें।हम डरने वालों में नहीं हैं। हम झुकनेवालों में नहीं हैं। यह लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है। 


सोमवार की सुबह जब देश की आँखें खुले उसे किस तरह की खबरों के लिये तैयार रहना चाहिए ? 




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