सरकार की पराजय को राष्ट्र की हार में बदलना चाहते हैं  मोदीजी ?

-श्रवण गर्ग 

महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पारित करवाने के लिए अमित शाह जिस ज़बर्दस्त तैयारी के साथ लोकसभा में आए थे उससे समझा जा सकता है कि 17 अप्रैल को हुई पराजय से सरकार को कितना बड़ा सदमा पहुँचा होगा  ! प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश में विपक्ष के ख़िलाफ़ फूटा ग़ुस्सा इसका प्रमाण है। राष्ट्र के नाम संदेश के पीछे के और क्या कारण हो सकता था ? आख़िरी बार ऐसा कोई संदेश 7 जून 2021 को कोविड के राष्ट्रीय संकट के दौरान प्रसारित हुआ था ! क्या संशोधन विधेयक पर पराजय को बीजेपी किसी राष्ट्रीय संकट में तब्दील करना चाहती है ?


(देश की जनता और नारी शक्ति क्या विपक्षी दलों-कांग्रेस, डीएमके, तृणमूल और सपा- के ख़िलाफ़ राष्ट्र के नाम संदेश में लगाए गए इन आरोपों में यक़ीन करेगी कि ये चार दल भ्रूण हत्या के अपराधी हैं और संशोधन विधेयक के विरोध का जो अपराध इन्होंने किया है उसकी उन्हें सज़ा ज़रूर मिलेगी ! )


अमित शाह द्वारा लोकसभा में दिये गये जवाब के पैंतीसवे मिनिट के दौरान जो हुआ उसके ज़रिए सरकार की पूर्व-तैयारी को समझा जा सकता है :


अमित शाह समझा रहे थे कि दक्षिण के पाँच राज्यों (तमिल नाडु, केरल, कर्नाटक ,आंध्र और तेलंगाना की वर्तमान में 129 सीटें हैं जो कुल 543 का 23.76 प्रतिशत होता है। परिसीमन पश्चात सीटों की संख्या 816 हो जाने के बाद इन पाँच राज्यों के सीटें भी बढ़कर 195 हो जाएँगी जो कि कुल सीटों का 23.87 प्रतिशत होगा। अतः डरने का कोई कारण नहीं है कि दक्षिण की सीटें कम हो जाएँगी । गृहमंत्री द्वारा यह नहीं बताया गया कि परिसीमन के ज़रिए ज़्यादा जनसंख्या वाले बीजेपी के राज्यों में सीटें दक्षिण भारत के मुक़ाबले कितने प्रतिशत बढ़ जाएँगी !


कांग्रेस के नेता के सी वेणुगोपाल द्वारा उठाई गई आपत्ति पर जब अमित शाह ने कहा कि विधेयक का विरोध करने का कारण अगर यह है कि आरक्षण के बाद सीटों की संख्या पचास प्रतिशत बढ़ जाएँगी ऐसा लिखित में चाहिये तो : ‘एक घंटे के लिए सदन स्थगित कर दीजिए।आधिकारिक संशोधन मेरे पास तैयार है। फोटो कॉपी करवा कर सभी सदस्यों को सर्कुलेट कर दूँगा।’


सत्तारूढ़ दल के सदस्यों की ओर से मेज़ों की थपथपाहट के बीच की गई अमित शाह की घोषणा  ने कुछ क्षणों के लिए वेणुगोपाल की ज़मीन खिसका दी। वेणुगोपाल की आपत्ति का आधार यह था कि विधेयक की जो प्रतियाँ वितरित की गईं थीं उनमें पचास प्रतिशत वृद्धि को लेकर लिखित में उल्लेख नहीं है। 


अखिलेश यादव ने मामले की नज़ाकत तो समझ तुरंत हस्तक्षेप कर दिया कि : सरकार को लेकर पिछले ग्यारह साल का जो अनुभव है उसे देखते हुए वह अगर वह यह भी लिखकर दे दे कि किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाएगी तब भी उस पर भरोसा नहीं करेंगे ।’


राहुल गांधी सदन में उपस्थित नहीं थे ! 


सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि विधेयक के जिस स्वरूप को संसद का विशेष सत्र बुलाकर सितंबर 2023 में पारित करवाया गया था उसका क्या हुआ ? लोकसभा की नई इमारत में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 888 और राज्यसभा की 245(250) से बढ़ाकर 384 क्यों की गई थीं ? जिस विधेयक पर 17 अप्रैल को मतदान हुआ उसमें राज्यसभा की सीटें बढ़ाने का उल्लेख क्यों नहीं था ?


वर्ष 2024 के चुनाव परिणाम अगर सरकार की मंशा के अनुरूप (चार सौ पार) आ जाते तो देश का संसदीय भविष्य और संविधान तो अभी तक बदला जा चुका होता !


क्या सरकार 2029 के चुनाव परिणामों को लेकर इतनी डरी हुई है कि विधेयक के ज़रिए बिना जनगणना-जातिगणना कराए सीधे परिसीमन के ज़रिए भाजपा-शासित राज्यों की सीटों के बहुमत से बाज़ी अपने पक्ष पलटना चाह रही थी ? 


विधेयक पर हुई पराजय से आहत मोदी क्या 2029 के चुनावों तक प्रतीक्षा करेंगे ? 


Comments

  1. बीजेपी ने अपने व्यवहार से विश्वास के लायक कोई काम नहीं किया

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog